कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ~दुष्यंत कुमार (Kaise Aakash Mein Surakh Nahi Ho Sakta)

कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ~दुष्यंत कुमार
कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता ~दुष्यंत कुमार

कैसे आकाश में सुराख नहीं हो सकता |

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता दुष्यंत कुमार द्वारा बोली गयी एक प्रसीद कविता हैं 

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो


कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो
~दुष्यंत कुमार


Kaise Akash Main Surakh Nahi Ho Sakta in English


rahanumaon kee adaon pe fida hai duniya
is bahakatee huee duniya ko sanbhaalo yaaro


kaise aakaash mein sooraakh nahin ho sakata
ek patthar to tabeet se uchhaalo yaaro
~ Dushyant Kumar


Dushyant Kumar

दुष्यंत कुमार (1 सितंबर 1933 - 30 दिसंबर 1975) आधुनिक हिंदी साहित्य के कवि थे। वह हिंदी ग़ज़ल लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं, और आम तौर पर 20 वीं शताब्दी के अग्रणी हिंदी कवियों में से एक के रूप में पहचाने जाते हैं।

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